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अपनी जिंदगी को डिफाल्ट में रखकर न जिएं बल्कि अपनी जिंदगी को अपनी मर्जी की डिजाइन से जिएं । जिंदगी फिर से शुरू करें और ठोस वास्तविकता को मूर्त रूप देने का काम करना प्रारंभ करें

यह जगत, जिसमें हम सभी रहते हैं, बिल्कुल ही अलबेला है । हम मिसाइल का प्रक्षेपण इतनी शुद्धता से कर सकते हैं कि वह विश्व के किसी भी कोने में अचूक निशाने पर मार कर सकती है, लेकिन हमारे पांव अपने नए पड़ोसी से मिलने के लिए गली में नहीं निकल पाते । हमें अपना अधिकांश समय टेलीविजन देखने में गवांना मंज़ूर है, लेकिन अपने बच्चों के साथ बैठकर बातें करना और उनसे जुड़ना मंज़ूर नहीं । हम यह जरूर कहते हैं कि हमें संसार को बदलने की जरूरत है, लेकिन हम खुद को बदलने को तैयार नहीं होते । और जब हमारे जीवन का सूर्यास्त होता है और हम जब अपने बीते हुए दिनों की समीक्षा करने लगते हैं, हम खुशियों की एक झलक देख पाते हैं जो हमारे अनुभव का हिस्सा हो सकता था, हम पाते हैं कि हममें दयालुता भी हो सकती थी या हम भी एक अच्छा इंसान हो सकते थे । लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । जब तक हममें से अधिकांश को होश आता है, तब तक तो चिरशांति में विलीन हो जाने की बारी आ जाती है । तो बस 

"अपनी जिंदगी को डिफाल्ट में रखकर न जिएं बल्कि अपनी जिंदगी को अपनी मर्जी की डिजाइन से जिएं । जिंदगी फिर से शुरू करें और ठोस वास्तविकता को मूर्त रूप देने का काम करना प्रारंभ करें।"



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