कुछ पा लेने के बाद
कुछ पा लेने के बाद जब हम एक ग्लास ठंडा पानी पीकर सुस्ताते हैं, तब याद आता है कि हमारा वो एक हिस्सा खो गया जो इतना कुछ पाना चाहता था। चलते-फिरते हम रोज कितना कुछ खोते जा रहे हैं कि याद ही नहीं आता है कि कब बैठकर हमने आसमान में तारे गिने थे। कब आखिरी बार अपनी एक हाथ की उँगलियों को दूसरे हाथ की उँगलियों से छुआ था। कब बिना बात के ऐसे ही अपने मोबाइल पर किसी बिसरे हुए दोस्त को बिना किसी काम कॉल किया था, दोस्त जो अब थोड़ा अजनबी हो चुका है। कब शोर के बीच हमने किसी चिड़िया की आवाज को बचाने की कोशिश की थी। कब हमने 12 महीने के बच्चे के जैसे धूप को कमरे में झाँकते हुए देखकर चौंके थे। कब डूबते सूरज के साथ दस रुपये की मूँगफली खाई थी। कब रात भर बातें की थीं। कुछ पा लेने की राह पर रोज भागते हुए भूल ही जाता है कि अपने खोए हुए हिस्से को बचा लेना ही जिंदगी है। हम शाम होने तक अपने पीछे एक पूरी दुनिया खोकर ऐसे खाली होकर साल गुजार देते हैं।

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