हम अपने लिए तभी जी पाते हैं जब हम औरों के लिए जीते हैं
जीवन का सर्वाधिक दुख:द पहलू मृत्यु को प्राप्त होने में नहीं है अपितु हमारे जीवित रहते हुए हम सचमुच जी पाने में असफल रहते हैं, इसमें है । हममें से न जाने कितने लोग अपने जीवन में छोटे बनकर ही रह जाते हैं, हम अपने मनुष्यत्व की संपूर्णता को सुबह की पहली किरण भी देखने नहीं देते । मैंने अंत में सीखा है कि जीवन में जो सबसे मूल्यवान है वह यह नहीं कि उसके पास कितने खिलौने हैं अथवा हमने कितना धन इकट्ठा किया है, बल्कि वह यह है कि हमने अपने बीच प्रतिभाओं में से कितने को मुक्त किया और ऐसे प्रयोजनों के लिए उनका उपयोग किया जिससे विश्व का मूल्यवर्धन हुआ हो । जो सर्वाधिक सच है वह यह है कि हमने कितनी जिंदगियों को स्पर्श किया और हम विरासत में क्या छोड़कर जा रहे हैं । अतः हम अपने लिए तभी जी पाते हैं जब हम औरों के लिए जीते हैं। वास्तव में सफलता का अनुसरण नहीं किया जा सकता । सफलता परिणामस्वरूप है और औरों के जीवन को समृद्ध बनाने में व्यतीत हुई आपकी जिंदगी के अनायास लेकिन अपरिहार्य बायप्रोडक्ट के रूप में आपके जीवन में प्रवाहित होती है । जब आपका फोकस जीवन की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए जीते रहने की अनिवायर्ता से हटता है, तब आपका अस्तित्व सफलताओं के थपेड़ों से झूम उठता है। अपने लिए तभी जी पाते हैं जब हम औरों के लिए जीते हैं ।

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