अलोचनात्मक दृष्टिकोण
यदि हम अपने देश की शिक्षा प्रणाली को देखें तो हम वस्तविक्ता कुछ और पाएंगे | ज़िंदगी का एक सच है कि जिस व्यक्ति की हम आलोचना करते है ऐसा व्यक्ति हम कभी नही बन सकते | हमारे में योग्यता होनी चाहिये यदि हमारे में योग्यता होगी तो जो हम चाहेगे वो ही बन जायेगे| जैसा हम सोचते हैं वैसा हम बन जाते है| यदि हम किसी की आलोचना करते हैं तो केवल हम एक अलोचक ही बनकर रह जायेगे|
अकसर मैने अपने जीवन में यह देखा है और महसूस किया है कि जब कोई शिक्षक किसी विषय को पढाता है तो वो उसको अपने ढंग या तरिके से पढाता है तो उस शिक्षक से पढे हुए छात्र भी उसी की नकल करके पढाते हैं जबकि हमे कोई विषय पढ कर अपने हिसाब से पढाना चाहिये ना कि अपने शिक्षक की नकल या कोपी करके| इससे हम केवल दूसरों के सिधान्तो को फौलो करते है | कुछ दिनो से मैं एक विचारक अरस्तु को पढ रहा था| उसने एक शिक्षा का सिधान्त दिया है उसने अपने सिधान्त में बताया है कि शुरुआती शिक्षा में बच्चों को *संगीत शिक्षा,खेल शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, व चित्रकला शिक्षा* आदि देनी चाहिये| संगीत शिक्षा से बच्चों की रुची बढेगी, खेल शिक्षा से बच्चों का मानसिक विकास होगा,चित्रकला संबंधित शिक्षा से बच्चों के सोचने की क्षमता शारीरिक शिक्षा से बच्चों का शारीरिक विकास होगा | लेकिन हमारे देश में शिक्षा कुछ और है बच्चों को छोटी सी आयु में इतना सारा पाठ्यक्रंम दे दिया जाता है जिससे उनका विकास रुक जाता है| मैने मेरे गाँव में ही देखा है कि जितना वजन बच्चों में होता है उतना ही वजन बच्चो कें बस्ते(bag) में होता है जिससे उनका शारीरिक विकास रुक जाता है और ऊपर से घर वालो का दबाव इतना होता है कि यहाँ से उनका मानसिक विकास रुक जाता है| ऊपर से सरकार ने ऐसी ऐसी नीति बनाई हुई है कि आठवीं कक्षा तक फ़ेल नही करने| इस नीति से बच्चों का विकास तो रुकता ही है साथ ही साथ शिक्षको का ज्ञान भी कम होने लगता है, क्योंकि ऐसे में शिक्षक भी पढाना पसंद नही करते और यदि किसी बच्चे को पढाते हुए गलती करने पर कुछ कह दिया तो घर वाले पंचायत लेकर स्कूल पहुंच जाते है| इससे भी एक मजेदार बात बच्चों को पठ्यक्रम मे पढाया जाता है कि *राम क्रिकेटखेलता है और सीता खाना बनाती है* छोटे होते ही उनकी मानसिकता ऐसी बना दी तो राम तो क्रिकेट खेलेगा ही और सीता तो खाना बनायेगी ही| फ़िर स्कूल-कालेजों में महिला साक्षरता के ऊपर कार्यक्रम करते है|
फ़िर जब बच्चे कालेज लेवल पर आते है फ़िर वो सोचते है हम आजाद हो गये फ़िर वो एक कोपी हाथ या अपनी पेंट की जेब में डाल कर आते है जहाँ से हमारी ज़िंदगी की असली शुरुआत होती है| जहाँ उनको खुद का भी पुरा ज्ञान नही होता कि कैसे रहना है कैसे किसी शिक्षक से बात करनी है| फ़िर थोडे दिन में हम अपनी डिग्री कर ही लेते है वो हमने जिस तरिके से की है वो सिर्फ एक कागज का टुकडा होती है | फ़िर ज़िंदगी का अगला पडाव शुरू होता है जहाँ हम कोई जोब या व्यवसाय के लिये निकलते है लेकिन हमको नही मिलती| फ़िर हम किसी नेता की शिफारिश के लिये चकर लगाते है नेता लोग बस अपना वोट बैंक बनाते है वो आपको काम नही दिलवा सकते| फ़िर हमारे पास आखरी रास्ता बचता है भगवान या किस्मत का फ़िर हम मंदिर जाते हैं शिवजी से कहते है हे भगवान ये दे दे वो दे दे | जो भगवान आप लोगों ने एक कमरे के अन्दर एक तालेके अंदर मुन्द रखा वो आपको क्या देगा वो तो खुद अपनी आज़ादी की कामना करता है| यहाँ हम भगवान से डरने वाले( God Fearing People) बन जाते है लेकिन यदि हम ये सोचें और कहें कि हे भगवान आप मेरे अंदर हो और हमेशा मेरे अंदर रहना और कुछ करने का होन्सला देते रहना तो भगवान आपके हमेशा साथ रहेगा और आप का साथ भी देगा यहाँ आप भगवान से प्यार करने वाले( God loving people) बन जाओगे|
और शायद आप खुद पे विश्वास करके और कुछ करके ही सफल हो जाओ |
-सतनाम कैत

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