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सपनों ने जिंदगी को...

भादो की दुपहरिया में यदि धूप निकले तो लगता है जैसे सूरज ने धूप को नहला धुला कर भेजा है धरती पर अपना रूप दिखाने के लिए..एकदम साफ़ सुथरी चमकदार धूप, जैसे कि इन भीगे भीगे खेतों में किसी ने एक चुटकी चाँदी मिला दी हो..मेरी जिंदगी में भी इस समय थोड़ा सा भादो लगा हुआ है..उम्र का छब्बीसवाँ साल अब बीतने को चला है..लेकिन लगता है जैसे दो सौ साठ साल देख लिए मैंने इन दो आँखों से अपनी..उपलब्धि के नाम पर एक करीब सात साल पुरानी बैंक की नौकरी और कमाई के नाम पर छत्तीस इंच की कमर भर है..हाँ, इसी बीच शादी भी हो गई और अब एक पौने दो साल का बड़ा ही जोरदार बेटा भी है..
मैंने कभी जिंदगी से कुछ चाहा या माँगा नहीं..बस जीना चाहा जी भर के...और हाँ, हंसिएगा मत जब छोटा था तभी से ये बड़ा मन करता था कि कुछ लड़कियाँ मुझे पसंद करें...लेकिन, बचपने से ही भगवान के दिए मेरे अनुपम रूप और लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर बुद्धि ने मेरे मन और कामना दोनों की मनोकामना पर ऐसा बाँध बनाए रखा जिसने इच्छाओं का हर प्रवाह रोके रखा...रही सही कसर मेरे हाई स्कूल के रिजल्ट ने पूरी कर दी...पता नहीं कैसे गणित में मेरे 34 नम्बर आ गए और मैं पास हो गया...शायद परीक्षक से ही कोई गलती हो गई होगी...लेकिन, बारहवीं वाले परीक्षक ने कोई गलती नहीं की..और एक साथ फिज़िक्स, कैमेस्ट्री, गणित और अंग्रेजी, चारो में फेल हुआ...इतना अनुभव आते आते एक सुधार मुझमें आ गया था..अब मैं दर्द भरी शायरियां लिखा करने लगा था..मुहल्ले के कितने ही रिंकुआ पिंकुआ की सेटिंग रिंकिंया पिंकिया से मेरी शायरियों ने करवा दी थी...एक नमूना देखिए...

"है ख़त में जो खून का कतरा वो मेरे दिल से निकला है,
बस कुछ दिन गुजरने दो, तो खत में सैलाब आएगा...."

ऐसी कालजयी शायरियां लिखना मेरे बाएं हाथ का खेल था😊...और मेरी शायरियों के दम पर कितनी ही प्रेमकहानियाँ टिकी रहती थीं...लेकिन, अफ़सोस की मेरी जिंदगी में प्रेम जैसे कट्टीस करके मिल्लिस करना ही न चाहता हो..लड़के कभी ट्रेन से आते तो बताते कि सामने वाली सीट पर ऐसी लड़की बैठी थी और पीछे वाले सीट पर वैसी लड़की बैठी थी...और एक मैं हूँ; ट्रेन में जाऊँ तो किसी कन्या की क्या कहें..सभी सीट पर दादाजी लोग ही मिले आज़तक... हर दुसरे स्टेशन हमसे ही कहें... "बेटा जरा पाँच रुपया का पकौड़ी तो ला दो..और ये ज़रा बोतल भी भर दो..बेटा ज़रा वो खीरा वाले को आवाज तो लगाना.." और मैं जलभुन जाता जब देखता कि बगल वाली बोगी में महिलाएं ही महिलाएं हैं....
पढ़ाई लिखाई तो मेरी हमेशा से ही निराली रही है..मुहल्ले की लङकियाँ पढ़ने में बड़ी तेज थीं...बी ए प्रथम वर्ष के भूगोल की परीक्षाएँ थीं..मैंने सुबह से ही भगवान से प्रार्थना की कि मेरे अगल बगल कोई लड़की ही पड़े...मेरी तो बाँछे ही ख़िल गई..जब मैंने देखा कि इसबार एक दो नहीं, मेरे चारों ओर लड़कियाँ ही लड़कियाँ थी...परीक्षा में अच्छे नम्बरों की उम्मीद बढ़ गई मेरी..करीब आधे घन्टे लिखने के बाद मैंने पीछे की देवी की ओर ध्यान से देखा...आहा! क्या रूप! क्या लावण्य!...दुबले पतले शरीर पर फिरोज़ी रंग का सूट, बदन से आती हुई लक्स की खुश्बू.. एक हाथ को माथे पर रखकर दुसरे हाथ से कलम घिसने की क्या अदा थी..परीक्षा में लड़कियाँ आराम से बात कर लेती हैं..इस दर्शन के स्मरण मात्र से ही मैं शरमा गया..और शर्म के साथ ही पूछ बैठा... "लॉन्ग आंसर में का कौन सा कर रही हैं?"...हाय! दिल पर क्या गुजरी मैं कैसे बताऊँ... जब उन्होंने दाँतो के बीच रेनॉल्ड्स वाले कलम का ढक्कन हौले से दबाकर कहा "मैं तो आपमें से ही कर रही हूँ, थोड़ा हाथ हटाकर लिखिए ना.."
वो तब था और आज अब है...लेकिन किसी कन्या द्वारा की गई मेरे जीवन की पहली और आखिरी बात थी....

जबसे नवल की माँ का पी जी आई लखनऊ में इलाज हो रहा है..हर महीने लखनऊ जाना पड़ रहा है...आज भी मैं जा रहा हूँ उत्सर्ग एक्सप्रेस से...स्टेशन पहुंचते ही वोटिंग रूम में जा बैठता हूँ...शायद मेरे जीवन का द्रोहकाल बीत गया हो या कोई और बात हो..वोटिंग रूम में दर्जनों महिलाएं थीं...महिलाएँ तो खैर महिलाएं ही होती हैं...लेकिन, ऐसा लगा जैसे वो कोने वाली एक लड़की मुझे कुछ जानने और पहचानने की कोशिश कर रही है..मुझे भरोसा नहीं होता..क्योंकि अब मैं पूरे मन से शादीशुदा हूँ और अब मेरी तोंद भी थोड़ी निकल गई है..लेकिन, भरोसा करना पड़ता है जब कोई दूर से आकर आपके पास बैठ जाए और कहे कि आप को देखते ही बस देखते रहने का मन करता है..भरोसा मेरा और बढ़ जाता है जब पता चलता है क़ि वो अकेली हैं और उन्हें भी उसी ट्रेन से यात्रा करनी है....बस टिकट वेटिंग का है...स्त्री की मदद को तत्पर मेरे भीतर का पुरुष खुद को गौरवान्वित महसूस करता है उस लड़की को खुद की कन्फर्म लोवर बर्थ पर चलने का प्रस्ताव देकर..और पुरुष गौरव से भर भी जाता है जब यह प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है..ट्रेन चल देती है...एसी जैसे जैसे तेज होता है..पहले चादर खुलती है, फिर कम्बल भी खुल जाता है...मैं संकोच से कहता हूँ "आपको ठँड लग रही है, ये कम्बल ओढ़ लीजिए..." दाँत में ऊँगली दबाकर धीरे से कहती है मोहतरमा "ठंडे तो आप भी हैं, कम्बल हमदोनों साथ नही ओढ़ सकते क्या.." सुनते ही लगा जैसे किसी सूखे मैदान पर अचानक बाढ़ का पानी आ गया हो या जैसे बर्फीले पहाड़ पर पीने को टाटा की चाय मिल गई हो....मैंने तुरन्त कम्बल खोलकर ओढ़ना ही चाहा कि कानों में नवल की माँ की आवाज गूँजती है....
"मेरी दवा कहाँ रखे हैं, निकालिए मिल नहीं रही है..दिन भर क्या घोड़े बेचे हैं..जो ट्रेन में पड़ते ही सो गए..दवा खोजिए और फिर जरा बेडिंग लगा दीजिए..और हाँ, अटेंडेंट से टॉवेल माँग लाइए.. दिया नहीं है..."

ओह! ये तो सपना था..मैं सो गया था...नवल की माँ तुमसे मैं कुछ नहीं कह सकता..तुमसे मेरी ये कालजई शायरी ही अब कुछ कह सकती है....

"सपनों ने जिंदगी को जीना सिखा दिया,
जो मिला उसी ने मुझको खोना सिखा दिया.."

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